बेटी का सफर




बेटी…
जन्म लेते ही घर का आँगन खिलखिला उठता है,
उसकी हँसी से दीवारें बोलने लगती हैं,
और उसकी मासूमियत से माँ–पापा की आँखों में सपने सजने लगते हैं।

लेकिन वही बेटी,
एक दिन अपने ही घर से पराई कर दी जाती है।
विदा के समय हँसती है, मुस्कुराती है,
पर अपना पूरा दिल उसी आँगन में छोड़ जाती है,
जहाँ उसने पहली बार चलना सीखा,
जहाँ उसकी गुड़िया-गुड्डे की शादियाँ हुईं,
जहाँ हर कोना उसकी कहानियाँ सुनाता है।

ईश्वर ने नारी के हृदय को सचमुच अद्भुत बनाया है—
बाहर से कोमल, फूल सा नाज़ुक,
पर भीतर से इतना अडिग कि हर तूफ़ान को सह ले।
दो पाटों के बीच जीना आसान नहीं होता,
पर बेटी अपने आप को ढाल लेती है,
मायके और ससुराल—दोनों में खुद को बाँटकर भी
सबको पूरा प्यार देती है।

वो रोती भी है, टूटती भी है,
पर किसी को अहसास तक नहीं होने देती।
उसका दिल पत्थर-सा मज़बूत होता है,
और उसकी आत्मा खुशबूदार फूल-सी कोमल।

यही तो बेटियों की पहचान है—
दुःख को मुस्कान में छुपा लेना,
और अपने आँचल से दो घरों को रोशन कर देना।